15 जनवरी 1949, भारतीय सेना Indian Army के लिए क्यों महत्वपूर्ण है: सेना दिवस Army Day
भारत इस साल 15 जनवरी 2023, को अपना 75वां सेना दिवस Army Day मना रहा है यह हर साल इसी तारीख़ को मनाया जाता है । यह दिन भारत के लिए बेहद ख़ास है क्योंकि ये भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है ।
बात करते है, 15 जनवरी 1949 की । ब्रिटिश शासन के करीब 200 साल के बाद पहली बार भारतीय सेना Indian Army को कमान मिली थी। इसलिए इस दिन भारतीय सैनिकों के योगदान, देश सेवा, उनकी उपलब्धियां और त्याग को सम्मानित किया जाता है।
आपको बता दें, 15 जनवरी 1949 ब्रिटिश सैन्य अधिकारी को कमांडर-इन-चीफ़ से भारतीय सैन्य अधिकारी को मिला था। भारत में कमांडर-इन-चीफ़ भारत के राष्ट्रपति को कहा जाता है जो तीनों सेनाओं के प्रमुख होते है। भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ़ फील्ड मार्शल के एम करियप्पा ने जनरल सर फ्रांसिस बुचर की जगह पदभार ग्रहण किया था। भारतीय सेना में कमांडर इन-चीफ़ का पद धारण करने वाले फ्रांसिस बुचर अंतिम ब्रिटिश व्यक्ति थे और उसी समय लेफ्टिनेंट जनरल, फील्ड मार्शल केएम करियप्पा थे।करियप्पा की उम्र 49 की थी उस समय के एम करियप्पा ने "जय हिन्द" के नारा को अपनाया जिसका अर्थ है "भारत की जीत"
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं के द्वारा ही भारतीय सेना का गठन किया गया था जो "ब्रिटिश भारतीय सेना" थी और स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना का जन्म हुआ। कहा जाता है कि भारतीय सेना के अन्दर फील्ड मार्शल का पांच सितारा रैंक वाले दो ही अधिकारी रहे हैं जिसमें पहले नम्बर पर केएम करियप्पा और दूसरे नम्बर पर फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ थे।
"किपर" नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है एक बार की बात है जब करियप्पा फ़तेहगढ़ में तैनात थे। उस समय ब्रिटिश अफ़सर की पत्नी को उनका नाम लेने में बहुत मुश्किल होती थी इसी वजह से अफ़सर की पत्नी ने उन्हें "किपर" पुकारना शुरू कर दिया।
आइए अब बात करते है के एम करियप्पा के जीवन की। जिनका जन्म 28 फरवरी 1900 को कर्नाटक में हुआ था और पहला विश्व युद्ध 1914-1918 के दौरान उनको सैन्य प्रशिक्षण मिला । और लेफ़्टिनेंट कर्नल का पद पाने वाले करियप्पा पहले भारतीय अफ़सर बन गये। और उनको 1944 में ब्रिगेडियर बनाया गया । बन्नू फ्रंटियर ब्रिगेड के कमांडर बतौर तैनात किया गया । 15 जनवरी 1986 को वे फ़ील्ड मार्शल बनाने की घोषणा की । उस समय उनकी उम्र 86 साल के करीब हो गयी थी। 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में फ़ील्ड मार्शल करियप्पा ने पश्चिमी कमान संभाली थी।
क्या आप जानते है कि लेह को भारत का हिस्सा बनाने में किसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी तो आज आपको इसके पीछे की कहानी बताते है।
बात है नवंबर 1947 की । इसी समय करियप्पा को सेना का पूर्वी कमान का प्रमुख बना कर रांची में तैनात किया गया था केवल दो ही महीने हुये थे कश्मीर में हालत ख़राब हो गयी। जिसकी वजह से उनको लेफ़्टिनेंट जनरल डडली रसेल की जगह दिल्ली और पूर्वी पंजाब का जीओसी इन चीफ़ बना दी गया। और उन्होंने इस कमान को नाम दिया पश्चिमी कमान। उन्होंने तभी कलवंत सिंह की जगह जनरल थिमैया को जम्मू-कश्मीर फ़ोर्स का प्रमुख नियुक्त कर दिया गया।
आदेश था कि लेह जाने वाली सड़क तब तक नहीं खोली जा सकती थीं, जब तक भारतीय सेना का जोज़ीला, ड्रास, और कारगिल पर कब्ज़ा नही हो जाता । तो हुआ ये कि इस आदेश की अवहेलना करते हुए वही किया। अगर वो ऐसा नहीं करते तो लेह आज भारत का हिस्सा नहीं बन पाता। और उनकी बनाई इस योजना के तहत भारतीय सेना ने पहले नौशेरा और फिर झंगर पर कब्ज़ा किया और उसके बाद जोज़ीला, ड्रास और कारगिल पर जो हमलावर थे उनको भी पीछे धकेल दिया और फतेह हासिल की।
और इस तरह भारत का सपना पूरा करते हुए के एम करियप्पा 1953 में सेवानिवृत्त हो गए थे और 1993 में 94 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

