लोहड़ी Lohri क्यों मनायी जाती है?
लोहड़ी(Lohri) क्यों मनायी जाती है? इस प्रश्न को लेकर अनेक मत है आज आपको यहां इसी प्रश्न का जवाब मिलने जा रहा है तो सबसे पहले बात करते है लोहड़ी का Origin कैसे हुआ?
इस पर कुछ लोगों का कहना है कि लोहड़ी की उत्पत्ति (Origin) का पता दुल्ला भट्टी की कहानी से लगाया जा सकता है। लोहड़ी हिन्दू मुस्लिम एकता का त्योहार है कहा जाता है कि अकबर के शासन काल में एक दूल्हा भट्टी नामक मुस्लिम राह लुटेरा था उसकी ख़ास बात यह थी कि लूट पाट के साथ साथ अच्छा काम भी करता था उन दिनों हिंदू लड़कियों को जबरदस्ती उठाकर मिडिल ईस्ट कंट्री में गुलामों के बाज़ार में बेच दिया जाता था वह लुटेरा उन हिंदू लडकियों को छुड़वाता था उन्हें अपनी बेटी समझकर उनकी हिंदू लड़कों के साथ हिंदू रीति रिवाज़ से शादी करवाता था माना जाता है कभी-कभी सड़क में ही लकड़िया जलवाकर ही फेरे करवा दिये जाते थे। दुल्ला भट्टी को सब लोग “चाचा” कहकर भी बुलाते थे । चाचा उन्हें दहेज के रूप में गुड़, चुरी, चने पॉपकार्न आदि देता था। शादी के दिन वह दुल्हा दुल्हन और उसके परिवार के सुरक्षा के लिए मुस्लिम डाकू साथियों को सिक्योरिटी के लिए लगाता था। कभी कभी उसके डाकू साथी जिनको वह भुला कहकर बुलाता था पुलिस के हाथ लग जाते थे इस तरह वह मुस्लमान डाकू हिंदू , पंजाबियों के लिए “हीरो” बन गया था। इसलिए दुल्हा भट्टी को धन्यवाद देने के लिए लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है। लोहड़ी का गीत गाया जाता है इस दिन कुछ लड़के लोगों के घरों में जा जाकर डूर वेल बजाते है लौहड़ी का गीत गाते है लोग बदले में, लोग उन्हें पैसे के साथ-साथ पॉपकॉर्न, मूंगफली, क्रिस्टल चीनी, तिल (तिल) या गुड़ देते हैं। और उन्हें खाली हाथ लौटाना अशुभ माना जाता है।लोहड़ी के गीत में ही दुल्हा भट्टी की स्टोरी छिपी है।
बता दें लोहड़ी पौष के आखिरी दिन सर्दियों के अंत और माघ की शुरुआत (12 और 13 जनवरी के आसपास) का समय है, जब सूर्य अपना मार्ग बदलता है। यह सूर्य और अग्नि की पूजा से जुड़ा हुआ है और सभी समुदायों द्वारा अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।
कुछ लोगों का मानना है कि लोहड़ी का नाम संत कबीर की पत्नी लोई से लिया गया है, क्योंकि ग्रामीण पंजाब में लोहड़ी का उच्चारण लोही के रूप में किया जाता है। दूसरों का मानना है कि लोहड़ी शब्द 'लोह' से आया है, एक मोटी लोहे की चादर तवा जिसका इस्तेमाल सामुदायिक दावतों के लिए चपाती पकाने के लिए किया जाता है। एक अन्य कथा कहती है कि होलिका और लोहड़ी बहनें थीं। जबकि पूर्व होली की आग में जल गया, बाद वाला बच गया। इस दिन तिल और रोढ़ी (गुड़) का सेवन करना अति आवश्यक माना गया है।
लोहड़ी के त्योहार के साथ होने वाली रस्मों में आमतौर पर गोबर (पशुओं के गोबर) से लोहड़ी देवी की एक छोटी छवि बनाना, उसे सजाना, उसके नीचे आग जलाना और उसकी स्तुति करना शामिल होता है। अंतिम समारोह सूर्यास्त के समय एक बड़ा अलाव जलाना है, उसमें तिल, गुड़, मिश्री डालकर फिर से उसकी परिक्रमा करना, उसके चारों ओर बैठना, गाना, नाचना तब तक है जब तक आग बुझ न जाए। लोग आग के अंगारों को अपने घरों में ले जाते हैं। पंजाबी गाँवों के घरों में चौबीसों घंटे उपलों से आग जलाई जाती है।
लोहडी क्यों मनाते है?
लोहड़ी एक पंजाबी त्योहार है जो मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में मनाया जाता है। यह सर्दियों के अंत और फसल के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। यह त्योहार प्रत्येक वर्ष 13 जनवरी को मनाया जाता है और अलाव, गायन और नृत्य के साथ मनाया जाता है। इसे शादियों के लिए भी एक शुभ अवसर माना जाता है और इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह भी माना जाता है कि यह त्योहार फसल के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है, और भरपूर फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है। पारंपरिक रूप से दोस्तों और परिवार के साथ इकट्ठा होने, अलाव जलाने और संगीत और नृत्य का आनंद लेने का समय है। लोहड़ी भरपूर फसल के लिए धन्यवाद देने और आने वाले साल में एक सफल फसल के लिए प्रार्थना करने का भी समय है। त्योहार का मुख्य आकर्षण लोहड़ी की आग है।
जिसके चारों ओर लोग इकट्ठा होते हैं, गाते हैं और नृत्य करते हैं। दोस्तों और परिवार के बीच मिठाई और पॉपकॉर्न भी बांटे जाते हैं ये त्योहार पूरे समुदाय को एक साथ लाता है, प्रत्येक परिवार तिल और गुड़ से बनी मिठाई, मूंगफली, तिलचौली और कई अन्य स्वादिष्ट घर के बने व्यंजनों का योगदान देता है। पंजाबी समुदाय गुरूद्वारा साहिब जाकर माथा-टेकते है और साथ में प्रसाद भी ले जाते है श्री गुरू ग्रंथ साहिब महीने के इस शुभ समय की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि जो लोग आग के सामने ध्यान करते हैं, वे धन्य होंगे। लोहड़ी, जो सर्दियों में उच्चतम बिंदु को चिह्नित करती है, विशेष रूप से नवजात शिशुओं के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है जिन्हें अलाव के चारों ओर ले जाया जाता है।
लोहड़ी से जुड़े अनुष्ठान और उत्सव केवल प्रकृति के लिए एक सामान्य धन्यवाद के प्रतीक हैं, जैसा कि सूर्य भगवान द्वारा दर्शाया गया है, और इस प्रक्रिया में, उत्सव भाईचारे, एकता और कृतज्ञता की भावना का प्रतीक हैं, जिसमें परिवार के पुनर्मिलन और बहुत सारी खुशियाँ पैदा होती हैं। एक ऐसा दिन भी है जब महिलाएं और बच्चे ध्यान आकर्षित करते हैं। दुल्हन की पहली लोहड़ी का खास महत्व होता है। नवजात शिशु चाहे लड़की हो या लड़का उसकी पहली लोहड़ी का भी उतना ही महत्व होता है। बच्चे घर-घर जाकर गाते हैं और लोहड़ी का प्रसाद मांगते हैं।
लोकप्रिय लोहड़ी पंजाबी गीत
Sunder mundriye ho!
Tera kaun vicaharaa ho!
Dullah bhatti walla ho!
Dullhe di dhee vyayae ho!
Ser shakkar payee ho!
Kudi da laal pathaka ho!
Kudi da saalu paatta ho!
Salu kaun samete!
Chache choori kutti! zamidara lutti!
Zamindaar sadhaye!
bade bhole aaye!
Ek bhola reh gaya!
Sipahee far ke lai gaya!
Sipahee ne mari eet!
Sanoo de de lohri te teri jeeve jodi!
Bhaanvey ro te bhaanvey pit!
हिंदी अनुवाद
ओह सुंदर और मुंदर , आपके बारे में कौन सोचेगा? दुल्हा भट्टी वाला हो । दुल्हा की बेटी की शादी हो गई । उसने 1 किलो चीनी दी। लड़की ने लाल सूट पहन रखा है लेकिन उसकी शाल फटी हुई है ।उसकी शाल कौन सिलेगा? मामा ने चूड़ी बनाई । जमींदारों ने लूटा । जमींदारों की पिटाई होती है। बचाने के लिए कई मासूम आए एक मासूम लड़का पीछे छूट गया ।पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस वाले ने ईंट से मारा । हमें लोहड़ी दे दीजिए.... आपकी जोड़ी लंबी चले।

