निबंध साहित्य का नाम : जीवन Life की चुनौती Challenge
लेखक :लक्ष्मीनिवास बिड़ला , श्री श्रीप्रकाशजी की प्रस्तावना सहित।
प्रकाशक :मार्तण्ड उपाध्याय, मंत्री, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली ।
पहली बार : 1969
मूल्य : दो रुपये।
प्रस्तुत पुस्तक के लेखक ने इस संग्रह में जीवनLife के अधिक गंभीर प्रश्नों को लिया है और उनके समाधान की खोज में गहराई से चिंतन किया है। फलत: यह पुस्तक भाव और भाषा की दृष्टि से गूढ़ बन गई और मनोयोगपूर्वक पढ़े जाने की अपेक्षा रहती है।
हिन्दी में निबन्ध बहुत लिखे गये है, लेकिन गूढ़ विषयों पर लघु निबंध आज भी कम पाये जाते हैं । इस दृष्टि से यह संग्रह हिन्दी साहित्य के अभाव की आंशिक पूर्ति करता है। यहां हम लेखक द्वारा लिखित प्रस्तुत का एक अध्याय प्रस्तुत कर रहे है। यदि आपको अच्छा लगे तो कमेंट सेक्शन में जरूर लिखें । जिससे और अध्याय इस संग्रह के आपको प्रस्तुत करा सके।
मन ही राखो गोय
मानव एक जागरूक प्राणी है। सुख के अनुराग के कारण वह वास्तविकता की परियोजना में स्वयं अपना विस्तृत तथा अतिरंजित मूल्यांकन कर बैठता है। जीवन के शैशव काल की प्रवंचनाएं, अतिमूल्यन तथा एकांगी महत्वाकांक्षाएं नैराश्य और भ्रांति निवृति के समक्ष घुटने टेक दे, यह अवश्यम्भावी है। मित्र प्राय: सभी को चाहिए। ऐसे व्यक्ति तो, जो एकाकी जीवन चाहते हैं अथवा जो सदा ही अपने विचारों के स्वनिर्मित संसार में बिहार करते रहते हैं, अपवादस्वरूप हैं। सामान्य मानव को चाहिए मित्र, समाज, प्रेम, सुख, प्रेरणा, प्रोत्साहन, मनोरंजन और यदाकदा अनुकूल आलोचना भी। वह जीवित रहता है या यों कहिए उल्लसित हो उठता है, अपने मित्रों की सहायता और संरक्षण से तथा अपने व्यक्तित्व के अन्तर्वाह्य शुभ आवरणों से। कुछ लोग अपने परिवार के एक या दो सदस्यों पर विश्वास करते हैं। मित्र कभी-कभी परिवार के बाहर भी मिलते हैं।
प्रकृति से मनुष्य का ऐसा स्वभाव है कि जबतक निज पर कोई आपत्ति नहीं आती वह व्यथा को ओझल रखना चाहता है। अपना निजी-से-निजी भी कोई क्यों न हो, उसके दु:ख से दूर रहकर बात भूलना चाहता है। पीड़ा या अवसाद के बहुत से कारण हो सकते है । व्यावसायिक असफलताओं के कारण दीर्घकालीन अधिकारों की हानि, अथवा अवकाश-प्राप्ति से भी अच्छी -खासी चिन्ता हो सकती है। अग्नि, बाढ़ अथवा अन्य दुर्दैव से गृहनाश के कारण भी ऐसा भावना पैदा हो सकती है, मानो मांगलिक शक्तियों ने किनारा खींच लिया हो। परिवार में मृत्यु भी ऐसी भावना के लिए उत्तरदायी हो सकती है। प्रिय वान्धवों का विछोह अथवा संग्रहीत पूंजी की हानि से भी सुरक्षा को आघात पहुंच सकता है और मनोविकारों एवं शारीरिक संताप को उसी काल्पनिक परिणामों तक उग्र कर सकता है। कभी-कभी अपेक्षाकृत अप्रत्यक्ष हानि भी वस्तुत: इतनी वास्तविक होती है जैसे, यौवन-क्षय, आकर्षण तथा स्फूर्ति का अभाव या ऐसे स्वप्न का भंग, जिनमें उत्तेजना और रोमांच का अन्त हो जाय।
ऐसी किसी भी दुर्घटना से वेदना हो सकती है। संताप महान व्यक्तियों को भी कातर बना देता है राजा युधिष्ठिर के न्याययुक्त जीवन के बारे में तो कोई कुछ कह ही नहीं सकता। युद्ध में पाण्डवों के सम्बंधी, मित्र और यहांतक कि पुत्रों में सबसे छोटा किशोर अभिमन्यु तक मारा गया। कौरवों की तो क्षति हुई ही, साथ ही कौरवों के साथ गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तक भी खेत आये। ऐसी दशा में युधिष्ठिर को मन: संताप होना स्वाभाविक ही था। फिर उनके छोटे भाई तो उन्हें पिता से भी अधिक सम्मान देते थे। पर ग्लानि से व्याकुल होकर जब युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को अपनी मनोव्यथा सुनाई तो अर्जुन से न रहा गया। वह कड़कककर बोला “ कैसा दु:ख, कैसा कष्ट और कैसी भीषण कातरता है! क्षात्र धर्म के अनुसार पृथ्वी हस्तागत करके भी इस समय क्यों बुद्धि लाघव के कारण आप यह सब त्यागने की इच्छा करते हैं? केवल मूर्खता के कारण धर्म और अर्थ को त्यागकर वनगमन करने के लिए तैयार हुए हैं?”
भीम ने भी साथ नहीं दिया। उसने कहा, “आपकी बुद्धि, कलुषित होने से, तत्वदर्शिनी नहीं रही है।“
रहीम का कहना बड़ा उपयुक्त है:
“रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुन अठलैहै लोग सब, बांटि न लैहै कोय।“
शेक्सपियर ने “किंगलियर” नाटक में एक दृश्य का वर्णन किया है:
“राजा लियर” अपनी सबसे बड़ी कन्या के पास रहता था कुछ समय के बाद उसे अनुभव हुआ कि उसका वहां उचित सम्मान नहीं होता और उसने स्वयं को अनादृत समझा। जब वह अपनी दूसरी लड़की के पास पहुंचा और उसने बड़ी लड़की के दुर्व्यवहार से जो पीड़ा हुई थी उसे व्यक्त किया तो सुनकर दूसरी लड़की ने कहा:
“श्रीमान् ! आप वृद्ध हो गये हैं। आपकी प्रकृति स्वभाव अब अंतिम सीमा तक पहुंच चुकी है। आपको शासित होने की आवश्यकता है और ऐसे विवेकपूर्ण नियन्त्रण की आवश्यकता है, जो आपके मनोराज्य को सम्हालने में आपसे अधिक समर्थ हो ।“
न्याय और अन्याय का विश्लेषण बहुत कम लोग करते हैं। अक्सर लोगों की प्रतिक्रिया किसी भी झंझट या दु:ख से दूर रहने की ही होती है।
अंग्रेजी में एक कहावत है कि “तुम हंसते हो तो दुनिया तुम्हारे साथ हंसती है। रोते हो तो अकेले रोते हो।“
मनुष्य-जीवन अलग-अलग छोटी कहानियों का नहीं बना होता है। यह तो एक लगातार चलने वाला अन्दरूनी उद्योग है, जिसमें एक घटना का असर आगे होने वाली दूसरी घटना पर पड़ता है। हर घटना का पहलू सोचकर, उसकी छाया को देखकर, अपना रास्ता खोज निकालना पड़ता है। चिन्तन करने वाले को अपनी बीती, चित्रपट की तरह, साफ दिखने लगती है, और यकायक वह सजग सूरमा बनकर सामने लटकनेवाली, झूठा भय दिखानेवाली कठपुतली को तोड़ निर्भय बन जाता है।
प्रत्येक मनुष्य के व्यक्तित्व की रचना में प्रधान प्रेरणा उसी मानसिक चित्र की रहती है, जो वह अपने सम्बन्ध में रखता है। उसकी मानसिक कल्पना का आधार होता है अपने माता-पिता के विषय में उसकी मनोवैज्ञानिक धारणा, उसका आदर्श और तत्सम्बन्धी स्वप्नचित्र, उसकी महत्वाकांक्षा का वह सार और आन्तरिक सामाजिक धाराओं का वह अमूर्त रूप जो उस सांस्कृतिक वातावरण का प्रतीक है, जिसमें वह रहता है। ऐसे तत्व कुछ अन्य मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के साथ जुड़कर मानव के अन्दर जो भाव उत्पन्न करते हैं, उसी को “आत्मभाव” कहा जा सकता है।
भर्तृ हरि ने कहा है:
छिन्ऩो अपि रोहित तरू: क्षीणोअप्युपचयिते पुनश्चंद्र:
इति विमृशंत: संतप्यन्ते न विप्लुलता लोके।“
अर्थात कटा हुआ वृक्ष फिर फैल जाता है और क्षीण हुआ चन्द्र फिर बढ़कर पूर्ण चन्द्र हो जाता है, यह समझकर बुद्धिमान पुरूष विपत्ति में नहीं घबराते ।
नल के उपाख्यान में आता है कि जब जुए में सब कुछ हार कर भूखे नल ने जंगल में पक्षी पकड़ने के लिए अपनी धोती उन पर फेंकी, तो वे धोती लेकर उड़ गये। व्यथित होकर उसने दमयन्ती को अपने दु:ख में भागी बनाना उचित न समझा, और विदर्भ के रास्ते में रात को उसे सोती छोड़कर अपनी व्यथा अकेले ही झेलने के लिए चल पड़ा। दमयन्ती अपने पिता के घर पहुंच गई। नल की आपदाओं का जब अन्त आया, वह दमयन्ती से आ मिला। नल का खास उद्देश्य रहा कि वह अपनी स्त्री और बच्चों को भी अपने साथ दु:ख न भोगने दे। यदि वह दमयन्ती को विदर्भ के अलावा और कहीं छोड़ देता तो वह गलत तरीका होता है पर दमयन्ती को अलग दिक्कतें न झेलनी पड़े, यह सम्हाल उसने कर ली।
किन्तु आज की समस्याएं और भी जटिल हो गई हैं। पग-पग पर नये प्रश्न उठते हैं और उनका जवाब तुरन्त देना पड़ता है। ऐसी जीवन-प्रणाली को, जो अपने सिवा दूसरे सबको ध्वस्त करने में तत्पर रहती है, मनुष्य ने गौरवान्वित करके अपनी कृतियों से ही अपनी रक्षा करने के साधन बहुत निर्बल बना दिये है। जिसे वह खुद ध्येय समझता है, और जो उसके लिए अध्येय है उनके बीच की सीमा इतनी कम हो गई कि अब वह कितना चाहकर भी अपने बचाव का साधन नहीं जुटा पाता।
विशेषकों का कहना है कि जो शक्ति मनुष्य को अपनी क्षमता के अनुसार शिखर पर पहुंचने से रोकती है, वह है हताशा। इससे मनुष्य के मन में विद्वेश, दु:ख और घृणा पैदा हो जाती है। इससे एक नैराश्य की दीवार खड़ी हो जाती है,जो मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकती है। दु:ख और हताशा दूसरे को सुनाकर हल्की जरूर हो जाती है, पर ऐसे मित्र या निजी सम्बन्धी बहुत कम होते हैं, जो पूरा सहयोग दे सकें। मनुष्य दुनिया में, बहुत-सी उमंगे लेकर आता है, और उन मांगों को आस-पास वालों से, समाज से पूर्ण कराना जरूरी समझता है। किन्तु जीवन की यात्रा लम्बे और कठिन राह से गुजरती है। सौभाग्यशाली है वह, जो सभी पड़ावों पर राजी-खुशी पहुंच जाता है।
आपत्काल में जो मनुष्य स्थिरतापूर्वक पर्वत शिला की तरह अडिग रहकर विपत्तियों का मुकाबला करता है, वही सम्मानपूर्वक रह सकता है। कातरता दिखाने वाले का तो कोई भी साथी नहीं।
